मुखौटों कि दुनिया

"यह दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है,
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है, 
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है,
यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?"

                    - फ़िल्म 'प्यासा' के गीत कि कुछ पंक्तियाँ                           

जब भी गुरु दत्त पर चित्रित यह गीत सुनती हूँ ,
सोचती हूँ कि इस गीत के हर शब्द का इतना गहरा मतलब क्यूँ है?
इस गीत में ऐसी क्या ख़ास बात है,
कि सालों बाद भी यह ह्रदय को स्पर्शित किये बिना नहीं रहता?

क्या वाकई में यह दुनिया किसी भी व्यक्ति-विशेष से परे है?
क्या सामूहिक विचारधाराओं के आगे व्यक्तिगत विचारों, भावनाओं आदि कि 
बलि हमेशा चढ़ेगी, और कोई कुछ न कर पाएगा?
क्या कोई भी व्यक्ति अपना अस्तित्व खोये बिना
समाज में सम्मिलित नहीं हो सकता? 
क्या ऐसा कोई नहीं जो अपने अधिकारों, धारणाओं कि 
आहुति दिए बिना अपना जीवन व्यतीत कर पाए?
जो अपने मूल्यों को जीवित रखकर बिना किसी  के जी सके?
शायद नहीं
और वही बात गुरु दत्त अपने चित्र द्वारा कहना चाहते हैं।
अर्थार्थ, कहीं न कहीं ,किसी न किसी रूप में हम सभी 
समाज से समझौता किये बिना नहीं रेह सकते

पर वास्तव में यह दुनिया इतनी कठोर क्यूँ है?
क्यूँ अपने मूल्यों पर चलते हुए
इस दुनिया में रहना सहज नही है?
एक ऐसा व्यक्ति जो ना तो किसी का बुरा सोचे,
ना किसी का बुरा कहे और ना ही किसी का बुरा करे;
क्या ऐसे वयक्ति के लिए इस दुनिया में रहना दुर्लभ है?
शायद हाँ

भले ही कई खोजों और आविष्कारों हेतु
हमारी यह दुनिया प्रगती के पथ पर
निरंतर चली जा रही है,
पर फिर भी कई मामलों में,
आज की यह दुनिया,
जैसे सदियो पहले थीवैसी अब भी है
अगर इस संसार में जीवन ज़रा भी शांति से व्यतीत करना है
तो एक वस्तु अत्यावश्यक है - मुखौटा - और वो भी बहुवचन में

और बदलते मौसम की भाँति
हर एक माहौल के लिए अनिवार्य है,
एक अलग मुखौटा
एक मुखौटा तब जब इच्छा के विपरीत,
अनचाही परिस्थितियोंव्यक्तियों आदि से आप जुंजना चाहें
आख़िर सामाजिक प्रगती की यह एक अटूट निशानी है
की जिस व्यक्ति से आप अत्यंत घृणा करें 
उसी के सामने आप सबसे ज़्यादा मुस्कुराएँ
यह बात और है के उसके पीठ घूमे लेनें पर
आप तुरंत उसकी ताबड़तोड़ निंदा शुरू कर दें

एक मुखौटा शोक प्रकट ना करने के लिए,
जब शोक मुख पर दिखना अनुचित हो
एक मुखौटा व्यंग्य से बचने के लिए;
और एक मुखौटा प्रसन्न दिखने के लिए
जब मन ही मन आप रो रहें हों
एक मुखौटा रिश्तेदारों के लिए - 
खास तौर पर ससुरालवालों के लिए;
और याद रहे वह हमेशा प्रसन्नता का रहे

एक मुखौटा सहकर्मियों के लिए,
की वो आपका असल चेहरा ना देख पाएँ - 
ख़ासतौर पर यदि आप अपने उच्यधिकारी के तलवे चाट कर
या किसी की निंदा कर उसका पत्ता काट कर,
सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने में विश्वास रखतें हैं
एक मुखौटा पास-पड़ोसियों के लिए - 
कि घर की बात घर ही में रहे,
चाहे पति अपनी पत्नी को घर की
काम वाली समझने की भूल निरंतर करे

एक मुखौटा ऐसे दोस्तों के लिए 
जो खुद मुखौटा पहने
आपके दोस्त बनने का स्वांग रचते हैं
एक मुखौटा अपने माता-पिता के लिए,
की वो बिचारे अपने बुढ़ापे में आपका दुख ना देख सकें
एक मुखौटा अपने भाई-बहनों के लिए,
ताकि वो सोचें की आप उनका साथ हमेशा देंगे
एक मुखौटे अपने बच्चों के लिए,
की कभी भी आप अपनी पीडा या लाचारियों की 
उनको भनक भीं ना पड़ने दें
एक मुखौटा अपने पति या पत्नी के लिए
की वो समझें की आप उन्हे पूरी तरह समझतें हैंचाहतें हैं

इन अनगिनत मुखौटों का कोई हिसाब है भला?
क्या कोई भी कभी सोचता है की 
वास्तव में वह कितने मुखौटे पहने हुए है?
क्या आपको कभी ख़याल आया 
की इन मुखौटों के बिना भी जिया जा सकता है?
क्या ये मुखौटे जीवन का इस कदर अभिन्न अंग बन गये हैं
के इन के बिना जीवन सार्थक नहीसंभव नही?
क्या हम इतने कमज़ोरइतने मामूली हैं
की कोई इच्छाशक्ति ही नही रही हुममे 
अपने आप पर विश्वास करने की?

क्या प्रगती इस कदर हम पर हावी हो गयी है
की हम जीवन मूल्यों से विहीन हो गये हैं?
क्या स्वयं को जो जैसा होबिना किसी मुखौटे के
दुनिया से सामने प्रकट करने से हम डरते ही रहेंगे?
क्यूँ हम ऐसे प्रतीत होने की कोशिश करते रहते हैं
जो हम नहीं हैं - और नहीं बन सकते?
और आख़िर क्या प्राप्त करने के लिए?
ऐसे बनावटिपन से जो भी हासिल हो
क्या वह ह्मे संपूर्ण रूप से तृप्त कर सकता है?
बिल्कुल नही

ऐसे जीवन व्यतीत करने से जो भी
हुमारा उद्देश्य होजो भी हुमारी प्राप्ति हो
वह केवल क्षणभर का सुख दे सकेगी
और ऐसा मिला सुख कभी भी आत्म्शन्ति प्रदान नही कर सकता
वह अंदर ही अंदर ह्मे झंझोर कर रख देगा
हम आत्मसम्मान के साथ कभी भी सिर उँचा कर  चल पाएँगे;
और आख़िरकार एक ऐसा भी दिन आएगा
की शीशे मे अपना प्रतिबिंब देख 
हम स्वयं को पहचान  पाएँगे
मुखौटे पहनने की लत इस कदर हो जाएगी
की अपना असली चेहरा भूल 
खुद को  दर-बदर ढूँढते फिरेंगे!

लेकिन मै तो बेकार ही इतना सब सोच रही हूँ
कोई कुछ भी कह लेकुछ भी कर ले
इस दुनिया का यह दस्तूर अकेला क्या कोई बदल सकता है?
दुनिया की झुंड प्रवर्ती का कोई 
ज़रा भी बाल बांका कर सकता है?
बिल्कुल नही
लफ्ज़ तो केवल पढ़ने के लिए होते हैं;
उनपर सोच विचार कर उनका सन्दर्भ समझने के लिए
समय और सहूलियत आख़िर किसके पास है?

सो मै लिखती हूँ अपनी आत्म्शन्ति के लिए
अपने अंदर मचल रहे शब्दों को
एक अभिव्यक्ति का स्रोत प्रदान करने के लिए
यह मेरा प्रयत्न है
अपनी प्रतिछाया से दू ना भागने की,
अपने प्रतिबिंब को दिन मे एक बार तो 
आँख मिला कर देखने की

और यह लोएक आहट सी सुनाई पड़ती है;
मेरी नन्ही बिटिया पाठशाल से  गयी है
चलो मैं भी अपना उतरा हुआ मुखौटा पहन लूँ,
मुस्कुरा कर अपनी बच्ची का स्वागत करूँ;
आख़िर वो नन्ही जान दुनिया की उलझनें क्या जाने?
क्यूँ वो मेरा गंभीरदुखी-सा चेहरा देखे?
अभी वक्त बहुत है उसके बड़े होने में
और बड़ों की ज़िंदगी समझने में
तब तक उसे अपनी मासूमियत की दुनिया में रहने दूं;
तब तक उसे ज़रा खुल के जी लेने तो दूं!

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